आरा: आनंद मार्ग प्रचारक संघ, आरा भुक्ति के सौजन्य से शारदा मैरेज पैलेस, आरा में आयोजित प्रथम संभागीय त्रिदिवसीय सेमिनार के दुसरका दिन आनंद मार्ग के वरिष्ठ आचार्य आचार्य रुद्रप्रकाशानंद अवधूत “रूप आ रूपातीत” विषय पर विस्तार से प्रकाश डालत कहलें कि रूप माने जे देखल जा सके, सीमित आ भौतिक बा, जबकि रूपातीत माने जे अदृश्य, अनंत आ आध्यात्मिक बा।
ऊ कहलें कि मनई बाहरी नाम-रूप में फँस के असली सत्य के भुला जात बा। जवन चीज हमनी के जड़ (Matter) बुझतानी, ऊ असल में शक्ति के एगो रूप ह। जब शक्ति पर तमोगुण के प्रभाव बढ़ जाला, त ऊ सीमित आ अंधकारमय दिखाई देवे लागेला।
भारतीय दर्शन के अनुसार प्रकृति में तीन गुण बा—
सत्त्वगुण – प्रकाश, ज्ञान आ शुद्धता।
रजोगुण – कर्म, गति आ इच्छा।
तमोगुण – जड़ता, अज्ञान आ अंधकार।
तमोगुण अनंत सत्य के सीमित बना देला, निराकार के आकार में बाँध देला आ अखंड सत्य के अलग-अलग रूप में देखावे लागेला। एह से मनई नाम आ रूप के आधार पर भेदभाव करे लागेला।
आचार्य जी सोना के उदाहरण देत कहलें कि हार, चूड़ी, अंगूठी अलग-अलग देखाला, बाकिर सभे के मूल तत्व सोना ह। ओही तरह मनई, पशु, जाति, धर्म आ देश अलग-अलग जरूर देखाला, बाकिर सभकर मूल चेतना एके परम चेतना ह।
ऊ कहलें कि साधना के असली उद्देश्य खाली पूजा-पाठ ना, बल्कि मन के अशुद्धि दूर कइल, अज्ञान मिटावल, “हम-तू” के भेद समाप्त कइल आ हर जीव में एके परम चेतना के अनुभव कइल बा। जब मन शुद्ध हो जाला त मनई सभमें परमात्मा के दर्शन करे लागेला आ द्वेष, ईर्ष्या आ संकीर्णता से मुक्त हो जाला।
आचार्य जी स्पष्ट कहलें कि धर्म आ Religion (मत-सम्प्रदाय) एक ना ह। मत-सम्प्रदाय लोग के अलग-अलग समूह में बाँट सकेला, जबकि सच्चा धर्म मनई के विशाल बनावेला, प्रेम, विवेक आ मानवता के राह देखावेला।
ऊ कहलें कि ईश्वर कवनो मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर चाहे मूर्ति में सीमित ना बाड़ें। परम सत्य के बाहरी आँख से ना देखल जा सकेला। ओकर अनुभव खातिर मन आ हृदय के शुद्ध कइल जरूरी बा। मूर्ति खाली एगो प्रतीक हो सकेली, बाकिर अनंत ब्रह्म के कवनो सीमित रूप में पूरा तरह बाँधल ना जा सके।
मन के अशुद्धि—लोभ, छल, हिंसा, घृणा, भ्रष्टाचार आ संकीर्णता—जब दूर हो जाला, तब भीतर परम चेतना के प्रकाश प्रकट होखे लागेला।
आचार्य जी कहलें कि सच्चा आध्यात्मिक साधक अन्याय के खिलाफ खड़ा होला, शोषण के विरोध करेला आ समाज में समता, सेवा आ मानवता स्थापित करे के प्रयास करेला। साधना खाली व्यक्तिगत मुक्ति खातिर ना, बल्कि पूरा समाज के कल्याण खातिर भी जरूरी बा।
साधना में ज्ञान, कर्म आ भक्ति तीनों के समान महत्व बतावत ऊ कहलें कि ज्ञान सही दिशा देला, कर्म ओह दिशा में आगे बढ़ावेला आ भक्ति साधना में प्रेम आ मधुरता भर देले। जइसे खाना में नमक ना होखे त स्वाद ना रहे, ओही तरह ज्ञान आ कर्म में भक्ति ना होखे त ऊ सूखल आ कठोर बन जाला।
ऊ उदाहरण देत कहलें—
पता जानल = ज्ञान
उहाँ तक पहुँचल = कर्म
प्रेम से दरवाजा खटखटावल = भक्ति
ई तीनों मिलके ही परमात्मा से मिलन के राह खोलत बा।
आचार्य जी कहलें कि सच्ची भक्ति में जाति, धर्म, सम्प्रदाय, ऊँच-नीच के कवनो जगह ना होला। प्रेम से भरल मनई कबहूँ संकट में पड़ल आदमी से ई ना पूछी कि ऊ हिन्दू बा कि मुसलमान, ब्राह्मण बा कि चाण्डाल।
ऊ कहलें—
“भक्ति भगवान के सेवा ह, भक्ति प्रेम के स्वरूप ह। भक्ति कवनो बाहरी कर्मकाण्ड ना, बल्कि जीव के भीतर जागल दिव्य प्रेम ह।”
आचार्य जी विद्या आ अविद्या के चर्चा करत कहलें कि अविद्या मनई के संसार में बाँधेला, जबकि विद्या आत्मज्ञान देके परमात्मा के ओर ले जाला। परमब्रह्म एह दुनों से परे बाड़ें।
कर्म के सिद्धांत समझावत ऊ कहलें कि मनई कर्म करे में स्वतंत्र बा, बाकिर हर कर्म के फल निश्चित बा। हर कर्म संस्कार बनावेला आ ओही संस्कार अगिला अनुभव आ पुनर्जन्म के आधार बन जालें।
ऊ कहलें कि आत्मा ना स्त्री ह, ना पुरुष आ ना नपुंसक। ई भेद खाली शरीर के बा, आत्मा त सभमें एक समान बा। एह से आध्यात्मिक साधना में स्त्री-पुरुष के भेदभाव के कवनो स्थान ना होखे के चाहीं।
गुरु के महत्व बतावत ऊ कहलें कि गुरु के कृपा से मन शुद्ध होखेला, बंधन टूटेला आ जीव अपना असली स्वरूप के पहचान लेला।
अंत में आचार्य जी कहलें कि ई संसार परमात्मा के लीला ह। अंतिम लक्ष्य परमब्रह्म में लीन होखल बा, आ एह राह के आधार ज्ञान, कर्म, भक्ति, प्रेम, आत्मसमर्पण आ नियमित साधना ह।
मुख्य संदेश
भक्ति कवनो बाहरी कर्मकाण्ड ना, बल्कि जीव के भीतर जागल दिव्य प्रेम ह।
अनंत ब्रह्म के कवनो सीमित रूप में पूरा तरह बाँधल ना जा सके।
ईश्वर कवनो सीमित रूप में बंधल ना बाड़ें, ऊ रूपातीत बाड़ें।
सच्चा आध्यात्मिक साधक अन्याय के विरोध करेला आ शोषण के खिलाफ खड़ा होला।
साधना खाली व्यक्तिगत मुक्ति खातिर ना, बल्कि समाज के भलाई आ मानवता के सेवा खातिर भी जरूरी बा।
भक्ति कवनो बाहरी कर्मकाण्ड ना, बल्कि जीव के भीतर जागल दिव्य प्रेम ह





