आरा: आनंद मार्ग प्रचारक संघ, आरा भुक्ति के सौजन्य से शारदा मैरेज पैलेस, आरा में प्रथम संभागीय त्रिदिवसीय सेमिनार के शुभारंभ भइल। पहिला दिन के मुख्य विषय “भक्ति रूप सेतु” रहल, जवना पर मुख्य प्रशिक्षक आचार्य रुद्रप्रकाशानंद अवधूत विस्तार से प्रकाश डाललें।उहाँ कहलें कि भक्ति जीव आ शिव के बीच के सेतु ह, जवना के माध्यम से साधक परम सत्य तक पहुँचे ला। ज्ञान आ कर्म एह मार्ग के तैयारी ह। ज्ञान से सही समझ पैदा होला, आ कर्म से ओह समझ के जीवन में उतारल जाला। जब साधक एह दूनो के सहारे आगे बढ़ेला, तब ओकरा भीतर सच्ची भक्ति के उदय होला, जे भवसागर से पार करावे वाली शक्ति बन जाला।आचार्य जी कहलें कि भक्ति स्वयं साधना नइखे, बलुक साधना के परिणाम ह। लगातार साधना, ज्ञान आ निष्काम कर्म के फलस्वरूप साधक के भीतर आनंद, प्रेम आ परमात्मा से एकत्व के अनुभूति जागेला। एह अवस्था में मन भाव-विभोर हो जाला, भक्त गावे, नाचे आ हँसे लागेला, आ अंत में समाधि के अनुभव करे लागेला। ई अनुभव केवल किताब पढ़ला से ना, बल्कि आत्मानुभूति से संभव बा।उहाँ कहलें कि परमब्रह्म सर्वव्यापक बा। ऊ हर कण, हर जीव आ पूरा सृष्टि में विद्यमान बा। सत्व, रज आ तम—प्रकृति के तीनों गुण परम चेतना के ही अभिव्यक्ति ह। जब साधक भक्ति में गहराई तक उतर जाला, तब ऊ एह सर्वव्यापक सत्ता के प्रत्यक्ष अनुभव करे लागेला।विश्व के भवानी शक्ति के अभिव्यक्ति बतावत आचार्य जी कहलें कि पूरा सृष्टि एके परम चेतना के विस्तार ह। ब्रह्म एके बा, आ सभे जीव ओही परम सत्ता के अंश हईं। एह आत्मानुभूति के बाद जीव आ ब्रह्म के बीच के भेद समाप्त हो जाला।उहाँ मन के चार अवस्था—चेतन, अवचेतन, अचेतन आ तुरीय—के चर्चा करत कहलें कि तुरीय अवस्था में साधक परम चेतना के अनुभव करेला। तंत्र साधना आ कुंडलिनी जागरण से मनुष्य उच्च चेतना तक पहुँच सकेला, जहाँ सहस्रार से दिव्य ऊर्जा के प्रवाह पूरा शरीर आ मन के आनंद से भर देला।आचार्य जी स्पष्ट कहलें कि शिव के अर्थ केवल देवता ना, बल्कि आदि चेतना, अनंत प्रकाश आ परम आनंद के स्वरूप ह। जब साधक आत्मानुभूति करेला, तब ओकरा भीतर “शिवोऽहम्” के अनुभव जागेला—अर्थात “हम ही शिव बानी।”सेमिनार के मुख्य संदेशभक्ति जीव आ शिव के बीच के सेतु ह।ज्ञान आ कर्म, भक्ति तक पहुँचे के साधन ह।भक्ति के उद्देश्य जीव आ शिव के द्वैत मिटाकर एकत्व के अनुभूति करावल ह।भक्ति स्वयं साधना ना, साधना के परिणाम ह।आत्मानुभूति से जीव आ ब्रह्म के भेद समाप्त हो जाला।अंतिम सत्य आनंद, प्रेम आ एकत्व के अनुभव ह।सेमिनार में आरा, बक्सर, रोहतास, भभुआ, बलिया, पटना, जहानाबाद, औरंगाबाद, लखीसराय, जमुई, शेखपुरा, नालंदा आ अरवल समेत 13 जिला से सैकड़ों पुरुष आ महिला भक्त शामिल भइल बाड़ें।तीन दिन चले वाला एह सेमिनार के मुख्य विषय “रूप आ रूपातीत”, “भक्ति रूप सेतु” आ “प्रउत” बा। मुख्य प्रशिक्षक आचार्य रुद्रप्रकाशानंद अवधूत बाड़ें। एह अवसर पर आचार्य रत्नमुक्तानंद अवधूत, आचार्य चिदम्बरानंद अवधूत, आचार्य रामकृपानंद अवधूत, आचार्य शुभचिंतानंद अवधूत, आचार्य जतींद्रानंद अवधूत, तात्विक जय मंगल देव, महेंद्र कुमार, मिथिलेश कुमार, शिव मोहन जी, अश्वनी जी, राजेंद्र जी सहित सैकड़ों साधक आ भक्तगण उपस्थित रहलें।
भक्ति के उद्देश्य जीव आ शिव के द्वैत मिटाकर एकत्व के अनुभूति करावल ह।







