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ईश्वर कवनो सीमित रूप में बन्हाइल ना हउवें, ऊ रूपातीत बाड़ें साधना खाली व्यक्तिगत मुक्ति खातिर ना, बल्कि पूरा समाज के भलाई खातिर भी जरूरी बा

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बोकारो: आनंद मार्ग प्रचारक संघ के ओर से प्रभात कॉलोनी, बोकारो स्थित आनंद मार्ग जागृति में चलत पहिला संभागीय तीन दिवसीय सेमिनार के दूसरा दिन आनंद मार्ग के वरिष्ठ आचार्य आचार्य नभातीतानंद अवधूत “रूप आ रूपातीत” विषय पर विस्तार से प्रकाश डाललें।
ऊ कहलें कि “रूप” माने जे देखल जा सके, सीमित आ भौतिक बा, जबकि “रूपातीत” माने जे अदृश्य, अनंत आ आध्यात्मिक बा। परमात्मा कवनो एक रूप, मूर्ति, मंदिर, मस्जिद भा गिरजाघर में सीमित ना हउवें। ओह लोग के अनुभव करे खातिर मन आ हृदय के शुद्ध करे के जरूरत बा।
आचार्य जी बतवलें कि ई संसार में जवन जड़ (पदार्थ) देखाई देला, ऊ असल में शक्ति के रूप ह। जब शक्ति पर तमोगुण के प्रभाव बढ़ जाला, त ऊ सीमित, अज्ञानमय आ अंधकारमय रूप में देखाई देवे लागेला।
भारतीय दर्शन के अनुसार प्रकृति के तीन गुण बा—
सत्त्वगुण – ज्ञान, प्रकाश आ पवित्रता।
रजोगुण – कर्म, गति आ इच्छा।
तमोगुण – जड़ता, अज्ञान आ अंधकार।
तमोगुण अनंत सत्य के सीमित बना देला, निराकार के आकार में बाँध देला आ अखंड सत्य के अलग-अलग नाम आ रूप में बाँट देला। एहसे मनुष्य बाहरी रूप देखकर भेदभाव पैदा कर लेला।
ऊ उदाहरण देत कहलें कि जइसे सोना से हार, चूड़ी, अंगूठी बनाला। रूप अलग-अलग होला, बाकिर सबके मूल त सोना ही होला। ओही तरह मनुष्य, पशु, जाति, धर्म आ देश अलग दिखाई देला, लेकिन सभे में एके परम चेतना के वास बा।
आचार्य जी कहलें कि साधना के असली उद्देश्य खाली पूजा-पाठ ना, बल्कि मन के अशुद्धि दूर कइल, अज्ञान मिटावल, “हम-तू” के भेद खत्म कइल आ हर जीव में परमात्मा के अनुभव कइल ह। जब मन शुद्ध हो जाला त आदमी सभे में एके परमात्मा के देखे लागेला, द्वेष, ईर्ष्या आ संकीर्णता से मुक्त हो जाला आ प्रेम आ एकता के अनुभव करे लागेला।
ऊ धर्म आ Religion (मत-सम्प्रदाय) के अंतर समझावत कहलें कि Religion अक्सर मनुष्य के अलग-अलग समूह में बाँट देला, जबकि सच्चा धर्म सबके एक मानेला आ प्रेम, विवेक आ चेतना के शिक्षा देला।
मूर्ति पूजा पर प्रकाश डालत ऊ कहलें कि मूर्ति खाली प्रतीक ह। अनंत ब्रह्म के कवनो सीमित रूप में पूरा तरह समेटल ना जा सके। जइसे नक्शा पूरा धरती ना होखे, ओही तरह मूर्ति परम सत्य के केवल संकेत हो सकेली।
ऊ कहलें कि गंदा दर्पण में चेहरा साफ ना देखाई देला। ओइसहीं लोभ, हिंसा, छल, घृणा, भ्रष्टाचार आ संकीर्णता से भरल मन में परमात्मा के अनुभव ना हो सके। एहसे मन के शुद्ध कइल सबसे जरूरी बा।
सच्चा साधक ऊ ह जवन अन्याय के विरोध करे, शोषण के खिलाफ खड़ा होखे आ समाज में समानता, मानवता आ प्रेम के स्थापना करे। साधना खाली व्यक्तिगत मुक्ति खातिर ना, बल्कि पूरा समाज के भलाई खातिर भी जरूरी बा।
ज्ञान, कर्म आ भक्ति के संबंध
आचार्य जी कहलें कि साधना शुरू करतहीं सिद्धि ना मिलेला। एह राह में ज्ञान, कर्म आ भक्ति—तीनू के बराबर जरूरत बा।
ज्ञान सही दिशा देखावेला।
कर्म ओह ज्ञान के जीवन में उतारेला।
भक्ति ज्ञान आ कर्म में प्रेम, मधुरता आ जीवन भर देला।
जइसे खाना में नमक ना होखे त स्वाद ना रहेला, ओइसहीं ज्ञान आ कर्म बिना भक्ति के अधूरा बा।
ऊ सरल उदाहरण देत कहलें—
कवनो आदमी के पता जानल = ज्ञान
ओहिजा पहुँचल = कर्म
दरवाजा खटखटाके प्रेम से बुलावल = भक्ति
तीनों मिलके ही मिलन संभव करेला।
सच्ची भक्ति
सच्ची भक्ति में जाति, धर्म, ऊँच-नीच आ सम्प्रदाय के भेद ना रहेला। जेकरा भीतर सच्चा प्रेम होला, ऊ संकट में पड़ल आदमी से ई ना पूछेला कि तू हिन्दू हउआ कि मुसलमान, ब्राह्मण हउआ कि चांडाल। भक्ति मनुष्य के भीतर करुणा, सेवा आ मानवता जगावेला।
विद्या आ अविद्या
आचार्य जी बतवलें कि अविद्या मनुष्य के मोह, अज्ञान आ देहाभिमान में बाँध देला, जबकि विद्या आत्मज्ञान देके परमात्मा के ओर ले जाले। परमब्रह्म विद्या आ अविद्या दुनो से परे बाड़ें।
कर्म, संस्कार आ पुनर्जन्म
मनुष्य कर्म करे में स्वतंत्र बा, लेकिन हर कर्म के फल जरूर मिलेला। हर कर्म एगो संस्कार छोड़ेला, आ ओही संस्कार भविष्य आ अगिला जन्म के दिशा तय करेला।
मृत्यु के बाद शरीर नष्ट हो जाला, बाकिर संस्कार जीव के साथ रहेला। ओही संस्कार के अनुसार जीव दोबारा जन्म लेला।
आत्मा आ स्त्री-पुरुष के भेद
आत्मा ना स्त्री ह, ना पुरुष आ ना नपुंसक। ई भेद खाली शरीर आ मन तक सीमित बा। आध्यात्मिक साधना में स्त्री-पुरुष के कवनो भेद ना होखे के चाहीं।
गुरु के महत्व
गुरु के कृपा से साधना मिलेला, मन शुद्ध होखे लागेला, बंधन टूटे लागेला आ जीव अपना असली स्वरूप के पहचान लेला। एहसे गुरु के परमात्मा के प्रतिनिधि मानल गइल बा।
लीला आ नित्यभाव
ई संसार परमात्मा के लीला ह। रूप अनेक दिखाई देला, बाकिर सभे में एके परम सत्ता काम करत बाड़ी। साधक धीरे-धीरे ई लीला से ऊपर उठके नित्यभाव में पहुँचेला, जहाँ कवनो भेद ना रहेला। ऊ अवस्था शुद्ध, निराकार, अनंत आ अखंड चेतना के अवस्था ह।
परम साधना
परमात्मा के खाली तर्क, विद्या भा शक्ति से ना पावल जा सके। उहाँ तक पहुँचे खातिर पूर्ण समर्पण, प्रेम, भक्ति आ आत्मनिवेदन के जरूरत बा। जब साधक अपना के पूरा तरह परमात्मा के समर्पित कर देला, तब ऊ परमब्रह्म में लीन हो जाला।
मुख्य संदेश:
ईश्वर कवनो सीमित रूप में बन्हाइल ना हउवें, ऊ रूपातीत बाड़ें।
संसार के सभे नाम आ रूप अस्थायी बा।
सभे जीव में एके परम चेतना के वास बा।
ज्ञान, कर्म आ भक्ति—तीनू साधना खातिर जरूरी बा।
सच्चा धर्म मानवता, प्रेम आ एकता सिखावेला।
साधना खाली अपना मुक्ति खातिर ना, बल्कि पूरा समाज के कल्याण खातिर भी जरूरी बा।

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